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भ्रामक विज्ञापन – उपभोक्ताओं को बचने की जरुरत

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उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ है कि उपभोक्ताओं को उनकी जरुरत के अनुसार जो उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं, उन्हें वे अच्छी और उपयुक्त गुणवत्ता की उपलब्ध हों तकि जो धन वे उत्पाद को क्रय करने अथवा सेवा को प्राप्त करने के लिए व्यय कर रहे हैं, उसका पूरा-पूरा मूल्य तथा लाभ उन्हें मिल सके।

उपभोक्ता, जो देश के कोने-कोने में सर्वत्र फैले हुए हैं, को विभिन्न उत्पादों और उपलब्ध सेवाओं की सही जानकारी देने की दृष्टिï से, उनका सही और उचित मार्गदर्शन करने के लिए और उत्पादों अथवा सेवाओ की विशेषताओं से उन्हें अवगत कराने के लिए उत्पाद निर्माता तथा सेवा प्रदाता विज्ञापनों का सहारा लेते हैं और इसी के द्वारा वे अपने विक्रय को बढ़ाते हैं।

आजकल विज्ञापन देने के भी कई माध्यम उपलब्ध हैं जैसे कि इलैक्ट्रिॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, सेल्स गल्र्स और सेल्स ब्वायेज, जो घर-घर जाकर उत्पाद एवं सेवाओं की जानकारी देते हैं। आदि।

विज्ञापनों का एक छोटा रूप पोस्टर और पैम्फ्लेट्ïस भी होते हैं परंतु इनके प्रचार-प्रसार का क्षेत्र सीमित होता है जैसे कोई किराना स्टोर, मिठाई की दुकान, इलैक्ट्रिक गुड्ïस की दुकान या डिपार्टमेंटल स्टोर, क्लॉथ स्टोर अथवा दर्जी की दुकान, कूरियर या एस.टी.डी. सेवा प्रदान करने का कार्य शुरू करता है तो वह अपनी उपस्थिति, उपलब्ध सामान या सेवा के बारे में क्षेत्र के निवासियों को सूचित करने और अपनी विशेषताओं की जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पोस्टर चिपकवाता है अथवा पैम्फ्लेट बंटवाता है। ये पोस्टर और पैम्फ्लेट्ïस उस प्रतिष्ठïान का विज्ञापन करते हैं।

परंतु विज्ञापन के व्यापक साधनों में मुख्य रूप से टीवी, रेडियो, समाचार पत्र, विभिन्न अवधि की पत्रिकाएं आदि आती हैं। इनमें से टीवी पर विज्ञापन देना सबसे महंगा पड़ता है परंतु विक्रय को बढ़ाने के लिए विज्ञापन देना एक सशक्त माध्यम है। इसलिए बड़ी-बड़ी निर्माता और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनियां तथा निगम विज्ञापन का ही सहारा लेते हैं।

विज्ञापन देने के लिए कौन सा माध्यम उपयुक्त होगा, यह निर्धारित करना उत्पाद निर्माता अथवा सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी पर निर्भर करता है। वैसे विज्ञापन सम्बन्धी कार्यों के लिए और विज्ञापन माध्यम के चयन के लिए आजकल छोटी-बड़ी विज्ञापन एजेंसियां सभी बड़े शहरों में खुल गई हैं जो इस बारे में परामर्श देने के साथ साथ
विज्ञापन डिजाइनिंग और उसके प्रसारण अथवा प्रकाशन तक की जिम्मेदारी उठा लेती हैं।

बाजार का परिदृश्य आजकल कुछ इस प्रकार का बन चुका है कि एक ही प्रकार के कार्य के लिए विभिन्न देशीय और विदेशीय कम्पनियों के विशिष्टï ब्रांड के उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध होने लगी हैं और यह संभव हुआ है आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की वजह से। और अब जब कोई उपभोक्ता किसी वस्तु को क्रय करने के लिए अथवा किसी सेवा को प्राप्त करने के लिए बाजार के लिए निकलता है तो विभिन्न ब्रांड और उनकी विभिन्न विशेषताओं को देख कर उसे किसी एक का चयन करने में बड़ी कठिनाई का अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में आमतौर से दुकानदार या डीलर उपभोक्ता को उस ब्रांड को क्रय करने की अधिक सिफारिश करता है जिसके विक्रय में उसका लाभ प्रतिशत अधिक होता है। परंतु इस प्रकार की बातों से कभी-कभी कोई उपभोक्ता भ्रम में भी पड़ जाता है और बिना कुछ क्रय किये वापस घर लौट आता है।

इसके विपरीत यदि कोई उपभोक्ता पहले से ही अपना मन बनाकर घर से निकले कि उसे कौन सी ब्रांड का उत्पाद क्रय करना है या किस ब्रांड की सेवा प्राप्त करनी है तो बाजार पहुंच कर वह उतनी असमंजस की स्थिति में नहीं होता। इसका अर्थ है कि आवश्यकता के अनुरूप जब किसी उपभोक्ता को कोई उत्पाद क्रय करना हो अथवा कोई सेवा प्राप्त करनी हो तो पहले उसे कुछ निश्चित होमवर्क कर लेना चाहिए। अब इस होमवर्क में विज्ञापन उसके मददगार साबित हो सकते हैं क्योंकि उत्पाद निर्माता अथवा सेवा प्रदान करने वाली कम्पनियां जब अपने ब्रांड के उत्पाद अथवा सेवा का विज्ञापन देती हैं तो वे उनकी विशिष्टï विशेषताओं को भी उजागर करती हैं। विभिन्न ब्रांडों के विज्ञापनों को देख-पढ़ कर और उनकी विशेषताओं को अपनी जरुरतों से मिलान कर कोई भी उपभोक्ता एक सीमा तक अपने मन को किसी एक ब्रांड के उत्पाद को क्रय करने के लिए तैयार कर सकता है। तब वह बाजार में भटकने की बजाय अपनी तयशुदा ब्रांड पर ही नजर डालेगा और उसे देख परख कर क्रय कर लेगा। इसी चयन प्रक्रिया में विज्ञापन उसका मार्गदर्शन करते हैं। उत्पाद यदि महंगा है तो विज्ञापनों के अतिरिक्त उपभोक्ता अपने दोस्तों, रिश्तेदारों के अनुभवों को जान कर भी अपना मन किसी निश्चित ब्रांड के उत्पाद के प्रति बना सकता है बशर्ते कि वह उत्पाद उनमें से किसी के पास हो जिसे इस्तेमाल करने का अनुभव उन्हें हो चुका हो।

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि विज्ञापन उपभोक्ताओं द्वारा वस्तु की ब्रांड के चयन में मार्गदर्शन का कार्य करते हैं बशर्ते कि विज्ञापन सच्चाई और ईमानदारी के साथ दिया गया हो अर्थात्ï उसकी विशेषताएं जो बताई गई हों, वह सही हों, सत्य हों और अनुभव पर खरी उतरें। परंतु अक्सर देखने में आता है और कई बार ऐसा होता भी है कि विज्ञापन उत्पाद या सेवा की अच्छाईयों का बखान तो कर देते हैं परंतु उनकी कमियों या सीमाओं का जिक्र तक नहीं करते, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं को कई बार हानि भी उठानी पड़ती है और उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

जब विज्ञापन कुछ कहे और उत्पाद अथवा सेवा उसके अनुरूप न हो और विक्रेता तथा उपभोक्ता के बीच विवाद खड़ा हो जाये तो उपभोक्ता अपनी सुरक्षा के मद्देनजर उपभोक्ता न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां उत्पाद अथवा सेवा विज्ञापन के अनुरूप न पाये जाने की स्थिति में उत्पाद निर्माता या विक्रेता अथवा सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी उपभोक्ता नयायालयों द्वारा दण्डित हुई है और उन्हें क्षतिपूर्ति करने के लिए बाध्य होना पड़ा है।

अत: जरूरी बात ये है कि वस्तु उत्पादकों, विक्रेताओं, सेवा प्रदाताओं को अपने विज्ञापनों के द्वारा उपभोक्ताओं को सही जानकारी पूर्ण ईमानदारी के साथ उपलब्ध करानी चाहिए। दूसरे, नैतिकता के आधार पर भी विज्ञापनों में केवल वही बात कही जानी चाहिए जो उपभोक्ता सुरक्षा के अनुरुप हो। तीसरे, विज्ञापन देते समय उत्पाद निर्माता, विक्रेता और सेवा प्रदान करने वालों को यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि अब उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार प्रत्येक उपभोक्ता के पास अन्य पांच अधिकारों के साथ कानूनी तौर पर सुरक्षा का अधिकार भी मौजूद है जिसका उल्लंघन होने पर वह उपभोक्ता न्यायालय के द्वारा क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का भी अधिकारी है। उपभोक्ता सुरक्षा की दृष्टिï से यह अत्यंत आवश्यक है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति पूर्णतया जागरूक हों।

उपभोक्ता के लिए परेशानी तब खड़ी होती है जब विज्ञापन में उसे गुमराह करने की बात कही जाती है जैसे च्यवनप्राश को ही लें। इसके बहुत से विज्ञापनों में बढ़-चढ़ कर दावे किये जाते हैं जबकि वास्तव में इसमें मुख्य औषधियां डाली ही नहीं जातीं और आंवले के स्थान पर शक्करकंदी का अधिक प्रयोग होता है। इसी प्रकार सॉस और कैचअप में टमाटरों के स्थान पर कद्दू का प्रयोग अधिक मात्रा में हो रहा है जबकि उसे टोमैटो सॉस ही बताया जाता है।

प्रौढ़ तो प्रौढ़, बच्चों को लक्षित करने में भी विज्ञापन किसी प्रकार पीछे नहीं हैं। जैसे चॉकलेट के संदर्भ में कहा जा रहा है कि ‘जो खावे, रह न पावे’ जबकि अधिक चॉकलेट खाने से दांतों और मसूड़ों के खराब होने का खतरा रहता है।

देखा जाये तो आजकल किसी भी आधुनिक घर में इतने कीटाणु नहीं होते होंगे जितने कि टूथपेस्टों और साबुनों के विज्ञापनों ने फैला कर रख दिये हैं। इनके अतिरिक्त घर और टॉयलैट की सफाई सम्बन्ध रसायनों के प्रचार हेतु विज्ञापन टीवी व अन्य माध्यमों में दिये जा रहे हैं परंतु विज्ञापन इस दिशा में कोई संकेत नहीं देते कि ये रसायन
विषैले भी होते हैं और इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए। इसी प्रकार मच्छरों से छुटकारा पाने के लिए मॉस्क्किटो मैट्ïस, कॉयल्स और द्रव रसायनों के विज्ञापन तो दिये जाते हैं पर इनके इस्तेमाल से निकलने वाले वाष्पशील पदार्थ स्वास्थ्य के लिए कितने हानिकारक हो सकते हैं, इसका जिक्र तक विज्ञापनों में नहीं होता जिससे
उपभोक्ताओं के सुरक्षा के अधिकार का हनन होता है।

अत: उत्पादों व सेवाओं के परिचय और उनसे होने वाले लाभों की जानकारी देने हेतु विज्ञापन जितने जरूरी हैं, उतनी ही जरुरत इस बात की भी है कि उनके इस्तेमाल में बरती जाने वाली सावधानियां और उनसे होने वाली हानियों का भी खुलासा किया जाये।

युवाओं को प्रभावित करने के लिए विज्ञापनों में फिल्म और खेल जगत के नामी चरित्रों को लेकर जहां उत्पाद या सेवा को महत्व प्रदान करने की होड़ सी लगी हुई है, वहीं ऐसा करने से विज्ञापन महंगे भी हो गए हैं क्योंकि इन विज्ञापनों से इन हस्तियों को करोड़ों-करोड़ों की आय होती है और कम्पनियां विज्ञापनों पर होने वाले इन सारे खर्चों को अपने उत्पादों अथवा सेवाओं के मूल्य में ही जोड़ देते हैं जिससे उत्पाद अथवा सेवा अनावश्यक रूप से महंगे हो जाते हैं।

आजकल उत्पादों और सेवाओं की सेल लगाना विपणन एवं विक्रय को बढ़ावा देने का एक सफल साधन बन गया है जिसमें उपभोक्ताओं को दी जाने वाली छूट के प्रचार सम्बन्धी विज्ञापन भी खूब दिये जा रहे हैं। कुछ एक प्रकार की सेल को छोडक़र बाकी सेल में दिया जा रहा डिस्काउंट फर्जी होता है और इस आशय के विज्ञापन उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी के अतिरिक्त कुछ नहीं होते। ऐसे विज्ञापन उपभोक्ता संरक्षण के विरुद्ध ही कहे जा सकते हैं।

विज्ञापनों में विशेष रूप से महिलाओं के इस्तेमाल पर, जहां उनको अद्र्ध वों में प्रदर्शित किया जाता है, प्रबुद्ध नागरिकों और कई संगठनों ने कई बार ऐतराज उठाये हैं। परंतु यदि इसे दोष या अश्लीलता कहा जाता है तो इसकी दोषी स्वयं वे महिलाएं भी हैं जो पैसे की खातिर इस प्रकार के चित्र खिंचवाने को तैयार होती हैं। अलबत्ता कुछ
विज्ञापनदाता स्त्रियों का इस्तेमाल कुछ ऐसे विज्ञापनों में भी करते हैं जहां उनकी जरुरत नहीं होती और पुरुषों को गुमराह करने की दृष्टिï से विज्ञापनदाता अपने विज्ञापनों में उनका इस्तेमाल करता है। ऐसे विज्ञापन भी उपभोक्ता हितों के विरोधी कहे जा सकते हैं।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई उत्पाद अनचाहे कारणों से उपभोक्ताओं के लिए असुरक्षित साबित होता है और उसके असुरक्षित होने का पता उसके इस्तेमाल से ही ज्ञात होता है जबकि अपने विज्ञापन में निर्माता कम्पनी अपने उत्पाद को हर प्रकार से बेहतर क्षमता वाला उत्पाद बताती है। परंतु जब कोई उपभोक्ता उस उत्पाद की कमी की शिकायत लेकर विक्रेता के पास जाता है और उत्पाद के असुरक्षित होने वाली बात कम्पनी तक पहुंचती है तो कोई-कोई कम्पनी उस उपभोक्ता की तो क्षतिपूर्ति कर देती है और अपने नए उत्पादों को सुरक्षित बनाने के लिए भी उसमें परिवर्तन कर देती है परंतु जो उत्पाद विक्रय के लिए उसने पूर्व में बाजार में वितरित किये हुए हैं, उनको वापस उठवाने के बारे में न सोचती है और न ही कोई ऐसा कदम उठाती है जबकि अमरीका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में ऐसे उत्पाद तुरंत बाजार से वापस उठवा लिये जाते हैं। शायद अपने देश में अभी इस प्रकार की संस्कृति का विकास हुआ ही नहीं है क्योंकि यहां का उपभोक्ता उन देशों के उपभोक्ताओं जैसा जागरूक हुआ ही नहीं है।

विज्ञापन का मुख्य कार्य उपभोक्ताओं को जानकारी उपलब्ध कराना होता है। इसी प्रकार यदि उपभोक्ता संरक्षण की जानकारी सम्बन्धी विज्ञापन दिये जायें तो उपभोक्ताओं को जागरूक करने की दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकता है। आजकल दूरदर्शन पर कुछ इसी प्रकार के विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं जहां उपभोक्ताओं को यह समझाया जा रहा है कि आई.एस.आई. मार्क वस्तुएं बेहतर होती हैं। अत: वे आई.एस.आई. मार्क वस्तुएं ही क्रय करें।

दूसरी ओर की वास्तविकता ये है कि जिन वस्तुओं के लिए आई.एस.आई. मार्क सरकार ने अनिवार्य किया हुआ है जैसे विद्युत के स्विच आदि तो भी बाजार बिना आई.एस.आई. मार्क के स्विचों से भरे पड़े हैं और इनके निर्माताओं और विक्रेताओं को कोई कुछ कहने वाला नहीं है।

तीसरे, बाजार में बहुत सा ऐसा सामान उपलब्ध होता है जिस पर नकली आई.एस.आई. मार्क लगा होता है परंतु विक्रेता उसे असली बताकर उपभोक्ताओं का शोषण करने से नहीं चूकता। सामान्य और साधारण उपभोक्ता को तो असली और नकली आई.एस. आई. मार्क का अंतर भी ज्ञात नहीं है।

उपभोक्ता संरक्षण और उपभोक्ता जागरूकता के क्षेत्र में यदि विज्ञापनों के इस्तेमाल को और अधिक बढ़ावा मिले तो उपभोक्ता जागरूक होकर स्वयं अपनी रक्षा करने के योग्य हो जायेगा। वैसे इस दिशा में उपभोक्ता संगठन और कई उपभोक्ता पत्रिकाएं उपभोक्ता जागरूकता और उपभोक्ता संरक्षण के कार्य को आगे बढ़ा अवश्य रही हैं परंतु अभी इस दिशा में बहुत कुछ करना शेष है। जब तक भारतीय उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगा तब तक बेईमान प्रवृत्ति के उत्पाद निर्माता और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनियां भ्रामक विज्ञापनों द्वारा उपभोक्ताओं का शोषण करती रहेंगी। अत: उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे विज्ञापनों को देख-पढ़ व समझ कर अंधानुकरण करने से बचें। दूसरों के अनुभवों का लाभ उठाते हुए और देख-परख कर ही अपनी मेहनत से अर्जित किये हुए धन को व्यय करें।