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फल-सब्जियों नहीं, जहर खा रहे हैं आप

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खेती से लेकर कृत्रिम रूप से पकाने तक फल और सब्जियों में अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग से इनका उपयोग हो रहा है घातक, सावधानी जरूरी ‘रोज एक सेब खाओ और बीमारियों को दूर भगाओ’ यह कहावत बेहद पुरानी है। लेकिन बदलते परिवेश ने इस कहावत को वाकई पुरानी कर दिया है। अब हर रोज एक सेब खाने का मतलब हो सकता है दुनिया भर की बीमारियां घर लाना। और यह केवल सेब के मामले में नहीं है, बल्कि दुनिया भर के फल और सब्जियों पर यह लागू होता है।

हरी सब्जियां और फल सदैव से ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी के रूप में जाने जाते रहे हैं और अक्सर बीमार लोगों को फल और हरी सब्जियां खाने की सलाह भी दी जाती है। सलाद जो लंबे समय से स्वास्थ्यवद्र्धक डिश के रूप में खाने का एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है, अब गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। फल और हरी सब्जियों में यह स्थिति इनमें बढ़ रहे घातक कैमिकलों का परिणाम है।

ये कैमिकल स्वत: इन फल और सब्जियों में नहीं आए हैं, बल्कि मानव की स्वार्थवृत्ति और किसी भी कीमत पर मुनाफा कमाने की भावना ने यह हालत उत्पन्न कर दी है। रासायनिक खादों के प्रयोग से जहां फसल के मौके पर ही ये सब जहरीले बनाए जा रहे हैं, वहीं इन्हें जल्दी पकाने और ज्यादा देर तक संरक्षित बनाए रखने के लिए इन घातक रसायनों का प्रयोग सारी सीमाएं लांघता जा रहा है।

इन घातक रसायनों ने न केवल फल-सब्जियों के पोषक तत्वों को नष्ट किया है, बल्कि इन्हें जहरीला बना दिया है। सदैव से ही हम ताजी सब्जियां और फल इन्हीं पोषण तत्वों के लिए खाते आए हैं। लेकिन अब आप इनके ताजेपन से प्रभावित मत होइए और ना ही इनकी साइज से। क्योंकि ये दोनों चीजें भी पूरी तरह नकली तरीकों से तैयार किए जा रहे हैं। सबसे घातक रसायन वही है जो इन्हें ताजा दिखाने, चमकदार बनाए रखने या इनकी वास्तविक साइज से बड़ा दिखाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

अगर आपको सही स्थिति देखनी है तो कहीं अधिक दूर जाने की जरुरत नहीं है। अपनी शहर की फल या सब्जी मंडी में चले जाइए और वहां के गोदामों में जाकर देखिए की किस तरह कच्चे फलों को कैमिकलों के जरिए पकाया जाता है और किस तरह फलों को सडऩे से बचाने के लिए उन पर जानलेवा प्रिजर्वेटिव्स रसायनों का छिडक़ाव किया जाता है। पहले किसान जैविक तरीकों से खेती किया करते थे और फसलें इस प्रकार के घातक रसायनों से दूर थीं। फसल के बदलाव और दूसरे प्राकृतिक तरीकों से खेती की जाती थी।

लेकिन जब से खेती का व्यावसायिकरण हुआ है और अधिक पैदावार किसी भी तरह करने की प्रवृत्ति ने जैविक एवं प्राकृतिक खेती को नष्ट कर दिया है, स्थितियां गंभीर होती जा रही हैं। अब किसानों के पास पैदावार बढ़ाने का मुख्य साधन रासायनिक खाद, जानलेवा कीटनाशक और वनस्पति नाशक बन गए हैं। मुख्य मकसद किसी भी तरह कम से कम क्षेत्र में अधिक से अधिक पैदावार हासिल करना बन गया है और फल-सब्जियों की गुणवत्ता इन सबके बीच पूरी तरह गायब हो गई है।

उत्पादकों की यह व्यावसायिक लोलुपता और घातक रसायनों का बढ़ता प्रयोग आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गए हैं जो लोगों में अनेक गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। फल-सब्जियों में फैलता यह जहर कितने ही लोगों की धीरे-धीरे जान ले रहा है और जिन लोगों को फल-सब्जियों की अधिक जरुरत है यानि बच्चे, वृद्ध और बीमार, उनके उपर इसका घातक और मारक प्रहार उतना ही अधिक है।

हमेशा यही समझा जाता रहा है कि फल और सब्जियां जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर की खान है जो हमें विभिन्न बीमारियों से बचाते हैं। यह भी माना जाता रहा है कि जो लोग अधिक फल और सब्जियां खाते हैं, वे कम फल-सब्जियां खाने वालों की तुलना में अधिक स्वस्थ रहते हैं। लेकिन अब स्थिति बदल गई लगती है। जो लोग
अधिक फल-सब्जियां खा रहे हैं, उनके लिए अब बीमारियों के खतरे उतने ही ज्यादा बढ़ गए हैं।

जिन रसायनों का फल-सब्जियों में सामान्यत: अधिक प्रयोग किया जा रहा है, खासतौर से उन्हें ताजा और चमकदार दिखाने के लिए, वे अधिकतर प्रतिबंधित हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण हैं, लेकिन इन सबके बावजूद इनका खुले आम प्रयोग फल-सब्जियों में किया जा रहा है। इनमें मुख्य तौर पर शामिल हैं ऑक्सीटोसिन। दूसरा कैमिकल जिसका सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है वो है कैल्शियम कार्बाइड।

यह तो सभी लोग जानते हैं कि कैल्शियम कार्बाइड का प्रयोग बारूद और दूसरे विस्फोटकों में किया जाता है लेकिन अब फल-सब्जियों में इसके प्रयोग ने आपको बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है जिसका विस्फोट कभी भी गंभीर बीमारी के रूप में आपके शरीर में नजर आ सकता है। कैल्शियम कार्बाइड फलों को जल्दी पकाने के लिए भी काम में लिया जाता है। यह आंखों और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।

फल-सब्जियों में सामान्यत: काम में लिया जाने वाला ऑक्सीटोसिन भी एक ऐसा ही घातक रसायन है जिसका उपयोग सामान्यत: उस समय गर्भवती महिला को दिया जाता है जबकि उसका गर्भ पूरे समय का हो चुका होता है और सामान्य डिलीवरी में बाधा आ रही होती है लेकिन अब इस इंजेक्शन का प्रयोग फल-सब्जियों को अनावश्यक रूप से फूलाने के लिए किया जा रहा है। इसका इंजेक्शन सब्जियों में पौधों के अंदर भी लगाया जाता है और तब भी लगाया जाता है जबकि वे त्वरित तौर पर बाजार में आने वाली हों।

ऑक्सीटोसिन का प्रयोग मुख्य तौर पर करेले, लौकी और पालक जैसी सब्जियों में किया जाता है। जबकि कैल्शियम कार्बाइड का प्रयोग आम, केले और पपीता जैसे फलों में किया जाता है।

दुनिया भर में इस संबंध में हुए अध्ययन और सर्वेक्षण बता रहे हैं कि इन घातक रसायनों का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, कमजोर, बीमार और वृद्धों को तो इसकी विशेष मार झेलनी पड़ रही है। बच्चों को इसकी मार इस वजह से झेलनी पड़ रही है कि यह उनके उन अंदरुनी हिस्सों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है जो निर्माण और विकास के दौर में होते हैं। इसका असर उनके भावी विकास पर सीधे तौर पर देखा जा सकता है। बच्चों पर इसका सबसे पहला प्रभाव उनकी विकास की गति को कम करने के रूप में नजर आता है। इसका दूसरा परिणाम यह होता है कि वे भविष्य में कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

जब एक गर्भवती महिला इस प्रकार की फल और सब्जियों का प्रयोग करती है तो उसका गंभीर प्रभाव उसके गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। बड़े लोगों में भी इनके कई गंभीर परिणाम सामने आते हैं जिसमें आंखों की रोशनी का कम हो जाना, नर्वस सिस्टम का कम काम करना, शरीर के विभिन्न अंगों के बीच आपसी समन्वय का कम हो जाना, कम समय में अधिक विचारों को सोचने की शक्ति का कम हो जाना जैसे प्रमुख परिणाम उन्हें भुगतने पड़ते हैं। इसके अलावा लंबे समय में जाकर कैंसर, किडनी फेल और दूसरी गंभीर स्कीन बीमारियों व मस्तिष्कीय व्याधियों का भी उन्हें सामना करना पड़ता है।

बाजार में बिक रही फल-सब्जियों में पेस्टीसाइड्स से सर्वाधिक प्रभावित चीजों में शामिल हैं सलाद के उपयोग में आने वाले हरे फल, पालक, शाक, आलू, गाजर, लाल मिर्च, हरी मिर्च, ककड़ी, टमाटर, पत्ता गोभी, मशरूम, नारंगी, केला, सेब आदि शामिल हैं।

केवल रासायनिक जहरीले पदार्थ ही नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थों की सही देखरेख नहीं होने से इनमें कई किस्म के बैक्टीरिया और कीटाणु भी प्रवेश कर जाते हैं जो फूड प्वाइजनिंग सहित कई दूसरी बीमारियों का कारण बनते हैं। ऐसा ही एक बैक्टीरिया है ‘ई-कोली’ जिसकी उपस्थिति अब फल-सब्जियों में भी बढऩे लगी है। पिछले दिनों पालक में ई-कोली पाए जाने के बाद दुनिया भर में हंगामा मच गया था। इसी प्रकार कई और बैक्टीरिया फल और सब्जियों में पाए गए हैं।

फल और सब्जियों को इस तरह जहरीला बनाने का खेल कई वजहों से फल-फूल रहा है। एक ओर तो जहां देश के अंदर ऐसी उच्च स्तरीय प्रयोगशालाओं का ही अभाव है जहां इनकी बारीकी से जांच हो सके, वहीं दूसरी ओर कानूनों में भी कमी है। जो कानून बने हुए हैं, वे भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहे हैं।

हर फल में दर्जनों कैमिकल्स – रासायानिक खादों का जहर
फल-सब्जियों को जहरीला बनाने में सबसे अहम भूमिका निभा रही हैं रासायनिक खादें। एक-एक फल-सब्जी में पचासों रासायनिक अवशिष्ट पाए गए हैं जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। आप सेब खरीदने जा रहे हैं या केला, सावधान हो जाइए। क्योंकि इनमें गंभीर रासायनिक सम्मिश्रण अपशिष्ट मौजूद हैं जो आपके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। आइए, देखें एक नजर की किस फल-सब्जी में कितने घातक रासायनिक अपशिष्ट मौजूद हैं और वे आपको किस-किस तरह का नुकसान पहुंचाते हैं। इसकी शुरुआत करते हैं सेब से।

सेब में 39 प्रकार के रासायनिक अपशिष्ट पाए गए हैं। ये इस प्रकार हैं – थाईबैंडेजोल, डाइफिनाइलएमाइन (डीपीए), एसिटामिप्रिड, एजिनफोस मैथिल, इमिडाक्लोप्राइड, कार्बेनडाजाइम (एमबीसी), फॉस्मेट, टेट्राहाइड्रोफ्थैलीमाइड (टीएचपीआई), ट्राइफलोक्साइट्रोबिन, फीनप्रोपैथरीन, कार्बारिल, बॉसकैलिड, ओ-फीनाइलफैनोल, कैपटेन,
इटोक्सेजोल, पाइराक्लोस्ट्रोबिन, फीनपाइराक्सीमेट, डाइफलूबैंजूरोन, पाइरीमैथैनिल, माइक्लोब्यूटेनिल, 1-नैफ्थोल, थाइक्लोप्रिड, इंडोसल्फान-ढ्ढढ्ढ, इंडोसल्फान-ढ्ढ, इंडोसल्फान सल्फेट, डाइएजीनोन, टैब्यूफैनाजाइड, क्लोरपाइरीफोस, साइप्रोडीनील, ब्यूप्रोफीजाइन, ओमेथोएट, डाइमैथोएट, मैथोमाइल, एस्फेनवेलेरेट+फैनवैलेरेट
टोटल, साइहैलोथ्रीन, टोटल (साइहैलोथ्रिन-एल + आर157836 एपीमाइर), क्लोफैंटीजाइन, ऑक्सेमाइल, क्लोरप्रोफाम, पाइरीप्रोक्सीफेन, परमैथिरीन ट्रांस, परमैथ्रिन सीस, फॉसेलॉन।

सेब में पाए जाने वाले इन 39 रासायनिक अपशिष्टों में से 5 कैंसर कारक हैं, 19 हॉर्मोन्स को नुकसान पहुंचाने वाले हैं, 10 नर्वस सिस्टम को बिगाडऩे वाले हैं और 5 शरीर के विकास को नुकसान पहुंचाने वाले हैं।

यह कहानी केवल सेब तक सीमित नहीं है। तमाम दूसरे फल और सब्जियों में ऐसे रासायनिक अपशिष्ट पाए गए हैं। अजमोला में ऐसे 55 कैमिकल हैं तो संतरे में 50 कैमिकल्स हैं। स्ट्रॉबेरी में ऐसे 42 घातक रसायनों के अपशिष्ट मिले हैं तो पत्तागोभी में 36 कैमिकल्स हैं। फूलगोभी में 19, अंगूर में 36, केले में 17 किस्म के अपशिष्ट पाए गए हैं। संतरे में पाए गए इन 50 कैमिकल्स में से 8 कैंसर कारक हैं, 24 हॉर्मोन्स को नुकसान पहुंचाने वाले हैं, 10 नर्वस सिस्टम को बिगाडऩे वाले हैं और 8 शरीर के विकास को नुकसान पहुंचाने वाले हैं।

इसी प्रकार अंगूर में पाए जाने वाले 36 कैमिकल्स में से 4 कैंसर कारक हैं, 17 हॉर्मोन्स को नुकसान पहुंचाने वाले हैं, 10 नर्वस सिस्टम को बिगाडऩे वाले हैं और 5 शरीर के विकास को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। यह पूरा चित्र बताता है कि रासायनिक खादों ने स्थिति को किस कदर बिगाड़ा है।

आखिर उपाय क्या – उपभोक्ता को खुद जागना होगा
फल-सब्जियों में बढ़ते जहर को रोकने के लिए और इससे स्वास्थ्य को हो रहे गंभीर खतरे से अपने को बचाने के लिए उपभोक्ता को खुद ही जागरूक और सतर्क होना होगा, तभी बचाव संभव है। फल और सब्जियों में कीटनाशक, रासायनिक खाद, प्रीजर्वेटिव्स और उन्हें जल्दी पकाने व ताजा दिखाने के लिए बहुत अधिक मात्रा में रसायनों का उपयोग किया जाता है। इसका आम आदमी के स्वास्थ्य पर बहुत ही गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। सरकारी एजेंसियां इसको रोकने में विफल रही हैं और अभियान कागजों में सिमटकर रह जाते हैं।

इस स्थिति से मुकाबला करने के लिए खुद उपभोक्ताओं को जागरूक होने की आवश्यकता है। फल-सब्जियों की खरीददारी करते समय और बाद में इनके उपयोग के समय उसे निम्र सावधानियां बरतनी चाहिए :-

  • फल और सब्जियों का चयन करते समय ये देखें कि उन पर किसी भी प्रकार के धब्बे और निशान तो नहीं हैं जो असामान्य प्रतीत होते हों।
  • फल और सब्जियों को खाने या पकाने से पहले इनको अच्छी तरह पानी से धो दें, विशेषकर बहते हुए पानी या नल के नीचे।
  • फल और सब्जियां स्थाई या जानकार दुकानदारों से ही खरीदें।
  • फलों को छिलने से पहले और सब्जियों को काटने से पहले उन पर लगे हुए कीटनाशकों को सही ढंग से साफ करें।
  • खुले बाजार से कटे हुए फल या सलाद नहीं खरीदें और उनके उपयोग से बचें।
  • कीटनाशी, खाद और रसायनों के असर को कम करने के लिए यथासंभव बाहरी पत्तियों वाले या अधिक पत्ते वाली सब्जियों जैसे पत्तागोभी आदि एवं अधिक पत्ते वाले फलों व सलाद के प्रयोग से बचें।
  • फलों और सब्जियों को डिटर्जेंट से न धोएं क्योंकि डिटर्जेंट का कुछ भाग फलों और सब्जियों और फलों में रहने का खतरा बना रहता है।
  • फलों और सब्जियों की गुणवत्ता को जांचने के लिए अथवा उनमें रासायनिक अपशिष्टों का पता कराने के लिए इनकी लेबोरेट्री में जांच कराएं।
  • फल और सब्जियों के प्रयोग से पहले अपने हाथों को साफ पानी एवं साबुन से धोएं।
  • फलों और सब्जियों को काटने के लिए साफ बरतन, साफ कटिंग बोर्ड और स्टील के चाकूओं का इस्तेमाल करें।

लें उपभोक्ता कानूनों की मदद
उपभोक्ता ऐसे मिलावटी मामलों में विभिन्न कानूनों की मदद भी ले सकता है। जहां वह खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत प्राधिकृत अधिकारी को शिकायत दर्ज करा सकता है, वहीं वह उपभोक्ता कानूनों की मदद लेकर नुकसानदायी फल-सब्जियां बेचने वाले लोगों के खिलाफ सीधे तौर पर भी कार्यवाही कर इससे होने वाले नुकसान के बदले क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है। इस संबंध में स्थानीय उपभोक्ता संगठनों से भी संपर्क किया जा सकता है।

बेअसर कानून – रोक के बावजूद बिकता जहर
देश के खाद्य अपमिश्रण नियंत्रण करने वाले कानूनों के तहत अनेक रसायनों पर प्रतिबंध है और अनुमति वाले रसायनों की भी मात्रा निर्धारित है। लेकिन बाजार में हो रहा है खुला कारोबार।

फल और सब्जियों में बढ़ते जहर को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं। विशेषकर खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम और अब खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के जरिए इस बात को सुनिश्चित बनाने की कोशिश की गई है कि फल-सब्जियों में अधिक मात्रा में घातक रसायनों की मौजूदगी को रोका जा सके। 1955 के पीएफए आदेशों के तहत कैल्शियम कार्बाइड के फल और सब्जियों के प्रयोग पर रोक लगाई गई है जिससे कैंसर भी होता है। इसी प्रकार फल-सब्जियों को ताजा दिखाने के लिए ऑक्सीटॉक्सिन के उपयोग पर भी रोक है।

इस संबंध में पीएफए की नियम 44(एए) में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति कार्बाइड गैस का उपयोग फल और सब्जियों को पकाने के लिए नहीं कर सकता। इसी तरह सब्जियों पर कृत्रिम रंग लगाने पर भी रोक लगाई गई है। पीएफए के नियम 48(ई) के तहत फल-सब्जियों पर किसी भी प्रकार की मोम, तेल या रंग नहीं लगाया जा सकता। लेकिन कानूनों की प्रभावी ढंग से पालना नहीं हो रही है।

कानूनी प्रावधानों के अनुसार फल-सब्जियों में कीटनाशकों या रासायनिक खाद के जरिए पहुंचने वाले कैमिकल्स के संबंध में अधिकतम रिड्यूशल लिमिट (एमआरएल) का भी प्रावधान किया गया है जिसके तहत इस बात को सुनिश्चित बनाया गया है कि फल-सब्जियों में इसकी मात्रा किस स्तर से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस संबंध में
पीएफए नियम 65 में विस्तृत विवरण दिया गया है।

खाद्य पदार्थों में मैटल और दूसरे खनिजों की मात्रा भी किस स्तर से अधिक नहीं होनी चाहिए, इस बात का भी स्पष्ट कानूनी प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था नियम 57 के तहत की गई है। इसी प्रकार नियम 57(ए) और 57(बी) में फल-सब्जियों में प्राकृतिक तौर पर पाए जाने वाले और फसल के दौरान होने वाले टॉक्सिक सब्सिटेंट्स के संबंध में भी मात्रा का निर्धारण किया गया है। मधुमक्खी की असली मोम के उपयोग की भी सीमा तय की गई है। अनेक रासायनिक खादों के उपयोग पर भी रोक लगाई गई है।

खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम कानून और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सभी राज्य सरकार और केन्द्रशासित प्रदेशों को जिम्मेदार बनाया गया है। हर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा आयुक्त/खाद्य सुरक्षा अधिकारी को संबंधित राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश में गंभीरता से सतर्कता बरतने और जांच
आदि कराने के निर्देश दिए गए हैं ताकि फल-सब्जियों में कार्बाइड गैस और दूसरे खतरनाक रसायनों का उपयोग न किया जा सके। इन्हें ऐसी स्थिति में कानूनी कार्यवाही करने के लिए भी जिम्मेदार बनाया गया है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इन कानूनों की प्रभावी क्रियान्विति नहीं हो पा रही है।