Market Watch

एमआरपी पर भी करवा सकते हैं मोलभाव

किसी भी वस्तु या सेवा की सही-सही कीमत का आंकलन लगाना आसान कार्य नहीं है और ऐसे में अगर वह वस्तु बहुत सी चीजों के मिश्रण और तकनीकी ज्ञान के चलते तैयार की गई हो तो यह कार्य और भी मुश्किल हो जाता है।

बदलते दौर में जबकि वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता और तकनीक में तेजी से बदलाव आ रहा है और बाजारों का अंतर्राष्टï्रीयकरण हो गया है तो कीमतों का सतही तौर पर आंकलन करना और भी मुश्किल हो जाता है।

जब आप बाजार में कोई सामान खरीदने जाते हैं तो चाहे साड़ी खरीदें या बिस्कुट, टूथपेस्ट खरीदें या नेल पॉलिश कुछ मिनटों के बीच आप किसी भी वस्तु की सही कीमत का आंकलन नहीं कर सकते। आपको यह भी पता नहीं होता कि उस वस्तु पर कौन-कौन से टैक्स लगे होने चाहिएं।

ऐसें में उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए डिब्बाबंद वस्तु अधिनियम के तहत इस बात का बंदोबस्त किया गया है कि डिब्बाबंद वस्तुओं के पैकेट्ïस के उपर निर्माताओं द्वारा एक प्रस्तावित कीमत प्रकाशित की जाए जिससे उपभोक्ताओं को उसकी वास्तविक कीमत के संबंध में अनुमान लगाने का अवसर मिल सके।

इस नियम का मकसद यह भी है कि उपभोक्ताओं से विक्रेता मनमानी और अधिक कीमतें नहीं वसूल कर सकें। इसके लिए पहले अधिकतम विक्रय मूल्य स्थानीय कर अतिरिक्त के रूप में प्रकाशित किया जाता था जिसे अब अधिकतम विक्रय मूल्य सभी करों सहित प्रकाशित किया जाता है। डिब्बे पर प्रकाशित इस अधिकतम विक्रय मूल्य को बोलचाल की भाषा में एमआरपी या छपी कीमत के नाम से जाना जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से इन कीमतों के प्रकाशन के संबंध में कोई प्रभावी कानून या नियंत्रण व्यवस्था ना होने के कारण डिब्बों पर छपी यह कीमतें उपभोक्ता के शोषण का बड़ाश बन गई है।

अग्रणी उपभोक्ता संरक्षण संस्था ‘केन्स’ द्वारा कुछ समय पहले कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि आधी से ज्यादा वस्तुओं पर भ्रामक कीमतें प्रकाशित की जा रही हैं और वास्तविक कीमतों से इसका कोई संबंध नहीं है। आप कोई वस्तु या सेवा क्रय करने बाजार में जाएं और आप से कहा जाए कि आपसे उस वस्तु या सेवा की ज्यादा से ज्यादा कीमत ली जाएगी तो आपको कैसा लगेगा? स्वाभाविक रूप से आप चाहेंगे कि आप सम्बन्धित वस्तु या सेवा की उचित या कम से कम कीमत अदा करें। लेकिन बदलती बाजार व्यवस्था में उपभोक्ताओं से ज्यादा से ज्यादा कीमत वसूलने का नया रिवाज चल पड़ा है और मजेदार बात यह है कि अधिकांश उपभोक्ता बिना यह वास्तविकता जाने अधिक से अधिक कीमत बिना किसी मोल-भाव के अदा भी कर रहे हैं। यह नई बाजार प्रथा उपभोक्ता से अधिक मूल्य वसूली रोकने के लिए शुरू हुई लेकिन अब खुद ज्यादा कीमत वसूलने का कारण बनती जा रही है। यह प्रथा प्रारंभ हुई है डिब्बा बंद वस्तुओं पर उनकी कीमत प्रकाशित किए जाने के चलते। उपभोक्ता हित में यह प्रावधान कियागया है कि प्रत्येक डिब्बा बंद वस्तु पर उसकी अधिकतम कीमत छापी जानी चाहिए।

दुर्भाग्य से आम उपभोक्ता एमआरपी के वास्तविक अर्थ को नहीं जानते हुए डिब्बाबंद वस्तुओं पर मुद्रित मूल्य को  इसका वास्तविक मूल्य मान बैठता है। इसका लाभ उठाकर बहुत से निर्माता वस्तुओं पर वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक मूल्य मुद्रित करा देते हैं और अंजान उपभोक्ता आसानी से ठगी का शिकार बन जाता है। इस सम्बन्ध में सरकारी कानून बहुत लचीले हैं और अधिकांश वस्तुओं पर किसी भी प्रकार का मूल्य नियंत्रण लागू नहीं है।

उदाहरण के लिए किसी मसाले का भाव क्या होगा इस संबंध में कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है और यह मसाला बनाने वाली कंपनी या उसके पैकर पर निर्भर करता है कि वह मसाले के डिब्बे पर क्या कीमत मुद्रित करे। एक ही प्रकार की मिर्च के पिसे मसाले की पैकेट पर अलग-अलग कम्पनियां अलग-अलग मूल्य मुद्रित करती है और केवल डिब्बे पर छपी कीमत देखकर भुगतान कर देने वाला उपभोक्ता आसानी से शोषण का शिकार बन जाता है।

उपभोक्ता को यह जानना चाहिए कि बाजार से खरीदी जाने वाली वस्तु का उचित या न्यूनतम मूल्य अदा करना न केवल उसका फर्ज है बल्कि यह उसका अधिकार भी है। उसे डिब्बे पर छपी कीमत के संबंध में दुकानदार से मोलभाव करना चाहिए और यदि उससे अधिकतम विक्रय मूल्य की मांग की जाती है तो उसे उसका विरोध करना चाहिए।

पूर्व में यह व्यवस्था थी कि डिब्बाबंद वस्तुओं पर छपी कीमतों पर स्थानीय कर अतिरिक्त मुद्रित होता था। उपभोक्ताओं से स्थानीय कर के नाम पर मनमानी वसूली को रोकने के लिए सभी करों सहित अधिकतम विक्रय मूल्य छापने का प्रावधान किया गया। अब कुछ गिने-चुने उत्पाद को छोडक़र सभी उत्पादों पर अधिकतम विक्रय मूल्य प्रकाशित किया जाता है। इसमें सभी संभावित कर पहले ही जोड़ लिए जाते हैं चाहे वे किसी क्षेत्र विशेष में प्रभावी ही नहीं हों।

इसी प्रकार अधिकतम खुदरा मूल्य में दूरदराज तक परिवहन पर होने वाला खर्च भी पूर्व में ही जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी वस्तु का उत्पादन दिल्ली में हो रहा है तो उसमें दूरदराज के क्षेत्रों तक परिवहन भाड़ा जोड़ कर कीमत प्रकाशित की जाएगी। यह दूरी 1500-2000 किलोमीटर तक हो सकती है। लेकिन यदि कोई उपभोक्ता दिल्ली में ही उक्त माल खरीदता है तो उससे भी यह राशि वसूली जाना पूरी तरह अनुचित है।

उपभोक्ता इन सभी तथ्यों के बारे में जागरूक होना चाहिए कि खरीददारी करने से पहले सम्बन्धित वस्तु के मूल्य की पूछताछ करनी चाहिए। यह पूछताछ विभिन्न स्तरों पर हो सकती है जैसे कि एक ही माल अलग-अलग दुकानों पर अलग-अलग मूल्य पर उपलब्ध हो सकता है। इसी प्रकार एक ही किस्म का माल अलग-अलग ब्राण्डों में अलग-अलग कीमत का हो सकता है। उपभोक्ता को तुलनात्मक पूछताछ के बाद ही वस्तु की कीमत अदा करनी चाहिए और हक के साथ दुकानदार से कहना चाहिए कि उससे अधिकतम विक्रय मूल्य नहीं बल्कि न्यूनतम विक्रय मूल्य वसूला जाए और हां, उपभोक्ता को यह भी जानना चाहिए कि छपी कीमत से अधिक राशि वसूलना पूरी तरह अनुचित और गैर कानूनी है और उसे अधिक राशि नहीं देनी चाहिए।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अधिकतम मूल्य के जरिए उपभोक्ता से ठगी न केवल खाद्य और दूसरे उत्पादों में हो रही है बल्कि इसके दायरे में दवाईयां जैसी जरूरी वस्तुएं भी शामिल हो रही है जिनके संबंध में उपभोक्ताओं को खरीद का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं होता और चिकित्सक की पर्ची पर बाध्य होकर मनमानी कीमत अदा करनी पड़ती है।

दस गुना तक पाई गई छपी कीमतें!
वस्तुओं पर छपी कीमतों में इस कदर गड़बड़ी है कि उपभोक्ता उसका अनुमान भी नहीं लगा सकता। छपी कीमतें कई बार वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक होती है। उपभोक्ता संस्था केन्स ने कुछ वर्षों पहले जब कुंजियों के खिलाफ अधिक मूल्य छापने के मामले में कार्यवाही की थी तो पता चला था कि इन पर छपी कीमतें उसकी वास्तविक कीमत से दस गुना अधिक है अर्थात्ï जिन कुंजियों पर मुद्रित मूल्य 40 रुपए था, वे मात्र 4 रुपए कीमत पर बाजार में बिक जाती थी। ऐसा ही आज दवाईयों के क्षेत्र में हो रहा है, जहां कई दवाईयों की कीमतों में रीटेल और खुदरा दरों में दस गुना तक अंतर है।