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दवाओं की शक्ल में बिक रहे हैं फूड सप्लीमेंट्स

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देश भर में दवाओं की शक्ल में फूड सप्लीमेंट बेचने का गोरखधंधा तेजी से फैल रहा है। मरीजों को गुमराह कर मोटा मुनाफा कमा रहे चिकित्सक व दवा विक्रेताओं पर नियंत्रण जरूरी।

दवा के नाम पर आपसे मनमानी कीमत वसूल कर आपको फूड सप्लीमेंट्स दिए जा रहे हैं। जी हां, यह दवाईयां नहीं हैं, बल्कि खाद्य सामग्री है और इनके जरिए उपभोक्ताओं से दस गुना से भी ज्यादा दरें वसूली जा रही हैं।

यह कोई एक-दो फूड सप्लीमेंट की बात नहीं है या एक-दो खाद्य सामग्री निर्माताओं का गोरखधंधा नहीं है, इस कारोबार में देश भर के लाखों डॉक्टर शामिल हैं, हजारों खाद्य पदार्थ निर्माता दवाओं के नाम पर यह सप्लाई कर रहे हैं और लाखों मेडिकल स्टोर इस खेल में शामिल हो चांदी कूट रहे हैं। अगर चपत लग रही है तो वह है गरीब उपभोक्ता, मरीज और उसके परिजन जो अंजाने में इन खाद्य सामग्रियों को दवाईयां समझकर मुंहमांगा दाम देने को मजबूर हैं।

मजेदार बात यह है कि जिन मेडिकल स्टोरों से यह बेची जाती हैं, उनमें से अधिकांश के पास खाद्य सामग्री बेचने का लाइसेंस भी नहीं है और ना ही खाद्य पदार्थों की जांच करने वाले फूड इंस्पेक्टर ही इन दवाओं की दुकानों पर जाकर इन खाद्य सामग्रियों का सही ढंग से सैंपल ही उठा रहे हैं। ऐसे में इनकी गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर संदेह है और मरीजों को गुमराह कर मोटा मुनाफा कमाने का यह गोरखधंधा चारों तरफ से फल-फूल रहा है।

देश में दवाईयां एक ऐसा क्षेत्र है, जहां प्राइस कंट्रोल एक्ट लागू है और सरकार ने बहुत सी दवाओं पर मूल्य नियंत्रण को प्रभावी किया हुआ है। लेकिन अपनी कथित दवा को फूड सप्लीमेंट के नाम से बेच कर इसके निर्माता सहज ही खुद को प्राइज कंट्रोल एक्ट की परिधि से ही बाहर कर लेते हैं।

उदाहरण के लिए प्रोटीन प्रोडक्ट्स की बात करें। सरकार की दवाओं पर लागू मूल्य नियंत्रण नीति के तहत प्रोटीन पाउडर के जिस डिब्बे की कीमत 20 रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए, उसे फूड सप्लीमेंट बताकर दवा विक्रेता 120 रुपए में उपभोक्ता को बेच रहे हैं। इसी प्रकार जिस मल्टी विटामिन सीरप की कीमत मूल्य नीति के तहत लगभग 19 रुपए तय है, उसे खुलेआम फूड सप्लीमेंट के नाम पर 70 रुपए प्रति बोतल बेचा जा रहा है।

यह तो दवाओं को फूड सप्लीमेंट बताकर मनमाना कीमत वसूल करने की बात है, वहीं इससे उलट बहुत सारे ऐसे फूड सप्लीमेंट्स जो बाजार में मुश्किल से 15-20 रुपए की लागत से उपलब्ध हो सकते हैं, दवाओं जैसी पैकिंग और शक्ल में डॉक्टर की पर्ची पर 150 से 200 रुपए में बेचे जा रहे हैं।

पहले तो उपभोक्ताओं के लिए यह पहचानना ही मुश्किल था कि कौन सा प्रोडक्ट दवा है और कौनसा फूड सप्लीमेंट या प्रोपराइटरी फूड। लेकिन अब इस संबंध में फूड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड कानून लागू होने के बाद इसका सहज ही पता चल जाता है क्योंकि फूड सप्लीमेंट्स के लिए एफएसएसएआई की अनुमति लेना जरूरी है और ऐसे प्रोडक्ट्स पर अब एफएसएसएआई का लोगो लगा होता है।

पहले तो कानून की कमियां और ऊपर से उनकी प्रभावी क्रियान्विति का अभाव, इस क्षेत्र में बड़े घोटाले का कारण बना हुआ है। नियमानुसार कोई भी विके्रता बिना खाद्य लाइसेंस के ऐसा फूड बेच नहीं सकता, लेकिन अधिकतर रिटेलर ड्रग लाइसेंस पर ही इसका बेचान कर रहे हैं।

राजस्थान के अजमेर के सामाजिक कार्यकर्ता टोपन दास जसवानी लंबे समय से इस मामले पर काम कर रहे हैं और उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्यवाही भी की है। उनके द्वारा पेश एक मामले का निपटारा करते हुए अदालत ने राज्य की ड्रग कंट्रोलर को निर्देशित भी किया कि वह इस संबंध में प्रभावी कार्यवाही करे। टोपन दास जसवानी इस संबंध में विभिन्न मंचों पर सतत् रूप से प्रयासरत हैं। उन्होंने इस मामले में फिजी सरकार की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा है कि फूड सप्लीमेंट्स की कीमतों पर भी प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए।

फूड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड कानून के तहत फूड सप्लीमेंट्स और दैनिक उपयोग के खाद्य या कृत्यकारी खाद्य या पोषणीय खाद्य को परिभाषित भी किया है और स्पष्ट किया है कि इससे निम्र खाद्य अभिप्रेत हैं –
(क) ऐसे खाद्य अभिप्रेत हैं जो विशिष्ट दैनिक आहार आवश्यकताओं को जो किसी विशिष्ट शारीरिक या मानसिक दशा या विनिर्दिष्ट रोग या विकार के कारण उत्पन्न होती है, पूरा करने के लिए विशेष रूप से प्रसंस्कृ त या तैयार किए जाते हैं और ऐसे खाद्य ऐसी स्थिति में ही प्रस्तुत किए जाते हैं जहां ऐसे खाद्य पदार्थों की संरचना उसी प्रकृति के सामान्य खाद्य की संरचना से काफी भिन्न होगी। यदि ऐसा सामान्य खाद्य विद्यमान है और इसमें निम्रलिखित में से कोई एक या अधिक संघटक अन्तर्विष्ट हो सकते हैं, अर्थात :-

(द्ब) जल, इथाइल अल्कोहल या हाइड्रो अल्कोहलिक सार में चूर्ण, सान्द्र या सत के रूप में पौधों या वनस्पति या उनके भाग एकल रूप में या समुच्चय;

(द्बद्ब) खनिज या विटामिन या प्रोटिन या धातु या उनके मिश्रण या अमीनों अम्ल (मात्रा में भारतीयों के लिए सिफारिश किए गये दैनिक भत्तों से अनधिक) या एंजाइम्स (अनुज्ञेय सीमाओं के भीतर);

(द्बद्बद्ब) पशु मूल से पदार्थ;

(द्ब1) कुल दैनिक भोजन में वृद्धि करके आहार की पूर्ति के लिए मानव द्वारा उपयोग हेतु आहार पदार्थ;

(ख)(द्ब) ऐसा उत्पाद जिस पर ‘विशेष आहार उपयोगों के लिए खाद्य या कृत्यकारी खाद्य या पोषक खाद्य या स्वास्थ्यपूरक या ऐसे ही अन्य खाद्य’ का लेबल लगाया गया है जो पारंपरिक खाद्य के रूप में उपयोग के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता है और जिसके द्वारा ऐसे उत्पाद चूर्ण, ग्रेनुल, टिकियों, कैप्सुलों, द्रवों, जैली और अन्य खुराक के रूप में तैयार किए जाते हैं किन्तु वे मूल नहीं होते और वे वहां के द्वारा खाये जाते हैं;

(द्बद्ब) ऐसे उत्पाद में औषधिक और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (23 ऑफ 1940) की धारा 3 के खण्ड (ख) में यथापरिभाषित औषधि और उसके खण्ड (क) और खण्ड (ज) में यथापरिभाषित आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी औषधि शामिल नहीं है;

(द्बद्बद्ब) किसी विनिर्दिष्ट रोग, विकार या दशा को ठीक करने या कम करने का दावा नहीं करता (कतिपय स्वास्थ्य फायदे या ऐसे संवर्धन दावों के सिवाय) जैसा इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा अनुज्ञात हो;

(द्ब1) इसके अंतर्गत स्वापक औषधि या मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (61 ऑफ 1985) और उसके अधीन बनाये गये नियमों मे यथापरिभाषित स्वापक औषधि या मन:प्रभावी पदार्थ और औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 की सूची (ङ) और सूची (ड1) में सूचीबद्ध पदार्थ नहीं है;

जरुरत इस बात की है कि कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए ताकि उपभोक्ताओं को खासकर मरीज जिसके पास डॉक्टर की पर्ची के सिवाय कोई चारा नहीं होता, मुंहमांगी कीमत पर खाद्य पदार्थ दवाओं के नाम पर जबरन न बेचे जाएं और उन्हें शोषण से बचाया जा सके।

क्या फर्क है
दवा, मेडिकल फूड, फूड सप्लीमेंट और खाद्य पदार्थ में

देश में बहुत बड़ी तादाद में फूड सप्लीमेंट को दवाईयां बताकर बेचा जाता है। इसमें न केवल डॉक्टर्स व मेडिकल स्टोर्स शामिल हैं, बल्कि कई मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियां भी ऐसे उत्पादों की बिक्री में शामिल हैं और उपभोक्ता को गुमराह कर रहे हैं।

इस पूरे गोरखधंधे को समझने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि वास्तव में दवा, मेडिकल फूड, फूड सप्लीमेंट और खाद्य पदार्थों में क्या फर्क है? आम आदमी इसको नहीं समझता। इसी का विक्रेता गलत फायदा उठा रहे हैं।

सामान्य खाद्य वह है जो हम रोजमर्रा खाने-पीने के काम में लेते हैं लेकिन जैसे-जैसे जागरुकता बढ़ रही है और बीमारियां बढ़ रही हैं, लोग ऐसे खाद्य की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष रूप से उपयोगी हो। इसके लिए बहुत से शब्द चलन में हैं। कुछ लोग इन्हें हैल्थ सप्लीमेंट के नाम से जानते हैं तो अलग-अलग जगह
सामान्यत: इसके लिए डायट्री फूड सप्लीमेंट, फूड सप्लीमेंट, न्यूट्रिशन सप्लीमेंट जैसे शब्द काम में लिए जाते हैं। वास्तव में दवा और न्यूट्रिशन सप्लीमेंट के बीच बहुत बारीक फर्क है और ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें एक ही फॉर्मूले को दवा या फूड सप्लीमेंट दोनों ही नामों से बेचा जा सकता है।

अमेरिका में इसको लेकर पहले से ही जागरुकता आ चुकी और वहां एफडीए ने जो कि खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण का काम करता है, इसके संबंध में कुछ मापदण्ड निर्धारित किए। सबसे पहले 1972 में फूड और ड्रग एडमिनिस्टे्रशन ने मेडिकल फूड के नाम से एक नया वर्गीकरण किया।

अमेरिका के फूड एंड ड्रग अथॉरिटी के अनुसार मेडिकल फूड उसे माना जाता है, जिसका फॉर्मूला विशेष रूप से कुछ खास किस्म की बीमारियों या कुपोषण के शिकार लोगों के लिए खाद्य के लिए बनाए गए विशेष फॉर्मूले से तैयार किया जाता है जो कि सामान्य खाद्य के जरिए मरीज या उपभोक्ता के लिए सहज उपलब्ध होना संभव नहीं है।

अमेरिका में इस संबंध में यह भी स्पष्ट प्रावधान हैं कि ऐसे उत्पाद के लेबल पर मेडिकल फूड लिखा होना चाहिए। साथ ही उस लेबल पर वह किस उपयोग और किन बीमारियों के संबंध में दिया जाना चाहिए, वह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए और इसका उपयोग मेडिकल सुपरविजन में ही किया जाना चाहिए।

जबकि दवा के संबंध में लगभग सभी देशों में जिसमें भारत भी शामिल है, स्पष्ट कानून बने हुए हैं और इसके लिए भारत में ड्रग कंट्रोलर तमाम तरह के कानूनी प्रावधानों को नियंत्रित करता है। फूड सप्लीमेंट भारत में सामान्यत: मेडिकल फूड के तौर पर काम में लिया जाता है लेकिन इसको नियंत्रित करने वाले स्पष्ट प्रावधानों की कमी है। मुख्य गड़बड़ी फूड को दवा बताकर बेचे जाने के संबंध में है।

क्या हैं एफएसएसएआई के प्रावधान :
बिना चिह्न और खाद्य लाइसेंस फूड सप्लीमेंट बेचना अवैध । खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के स्थान पर देश में प्रभावी हुए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम में इस
बात का स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि बिना एफएसएसएआई अनुमति ऐसे उत्पाद नहीं बिकें और इन्हें खाद्य लाइसेंस से ही बेचा जाना चाहिए।

भारत में खाद्य पदार्थों को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर कई कानून प्रभावी रहे हैं। पूर्व में खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम प्रभावी था लेकिन यह कानून तमाम जरूरी कानूनी जरुरतों को पूरा नहीं करता था। अत: सरकार ने फूड सेफ्टी और स्टैण्डर्ड एक्ट 2006 में पारित किया और अब यह देश के अधिकांश हिस्सों में प्रभावी है। इस कानून के सेक्शन 22 में स्पष्ट किया गया है कि इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए विनियमों में जैसा उपबंधित है, उसके सिवाय कोई व्यक्ति कोई आदर्श खाद्य, आनुवंशिक रूप से उपांतरित खाद्य पदार्थ, किरणित खाद्य, कार्बनिक खाद्य, विशेष दैनिक आहार खाद्य, कृतकारित खाद्य, पोषणीय, स्वास्थ्यपूरक तत्व, सांपत्तिक खाद्य और इसी प्रकार के अन्य खाद्य पदार्थों का विनिर्माण, वितरण, विक्रय या आयात नहीं करेगा।

ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि इस प्रकार का कोई भी खाद्य खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के अनुसार ही होना चाहिए। ऐसे सभी प्रकार के खाद्यों पर निश्चित पैकिंग विधि से पैकिंग करना और लेबल लगाने के नियम भी निर्धारित किए गए हैं और यह साफ कर दिया गया है कि लेबलों पर ऐसा कोई कथन, दावा, डिजाइन या युक्ति अंतर्विष्ट नहीं होगी जो पैकेज में अंतर्विष्ट किसी विशिष्ट खाद्य उत्पाद के संबंध में मिथ्या या भ्रामक हो या मात्रा संबंधी या ऐसे पोषकीय तत्व जो चिकित्सकीय हो या थैरेपेटिक दावे के हो या उक्त खाद्य उत्पादों के मूल स्थान के संबंध में हो।

कानून में यह भी साफ कर दिया गया है कि प्रत्येक खाद्य कारबारकर्ता यह सुनिश्चित करेगा कि खाद्य के लेबल एवं प्रस्तुतिकरण जिसके अंतर्गत उनके आकार, रूप या पैकेजिंग, प्रयुक्त पैकेजिंग सामग्री, वह रीति जिसमें वह व्यवस्थित है और उस सैटिंग में जिसमें वह प्रदर्शित किए जाते हैं और वह सूचना जो किसी भी माध्यम से उसके बारे में उपलब्ध कराई जाती है, उपभोक्ताओं को मार्ग भ्रष्ट नहीं करती।

लेकिन इन मामलों में यह देखा जा रहा है मेडिकल स्टोर्स में बेचे जा रहे इन फूड सप्लीमेंट्स में लेबलिंग इस प्रकार की जाती है, जैसे कि सामान्य तौर पर दवाईयों की की जाती है और उपयोगकर्ता और उपभोक्ता को यह भ्रम पैदा किया जाता है, मानों वह कोई फूड सप्लीमेंट नहीं, बल्कि कोई दवा खरीद रहा हो। इस कानून में ही इस बात को भी जरूरी बनाया गया है कि कोई भी व्यक्ति, कोई भी खाद्य कारबार अनुज्ञप्ति के अधीन ही प्रारंभ करेगा या उसे चलाएगा जिसके तहत पंजीयन आवश्यक किया गया है।

तेजी से फैलता भ्रामक दवाओं का गोरखधंधा:
हर साल दस से पन्द्रह फीसदी बढ़ रहा है कारोबार। जैसे-जैसे लोगों में न्यूट्रिशन के प्रति जागरुकता आ रही है, वैसे-वैसे ही इसकी आड़ में यह गोरखधंधा भी तेजी से फैल
रहा है। लोग विटामिन्स और प्रोटीन्स के लिए जब दवा खरीदने जाते हैं तो उन्हें यह फूड सप्लीमेंट्स दवा के रूप में बेच दिए जाते हैं।

देश में दवाओं की आड़ में फूड सप्लीमेंट बेचने का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ रहा है और यह वास्तविक तौर पर न्यूट्रिशन सप्लीमेंट के कारोबार से भी कई गुना अधिक फैला हुआ है। न केवल यही, बल्कि जैसे-जैसे सरकार की ओर से दवाओं पर मूल्य नियंत्रण को कड़ा किया जा रहा है, वैसे-वैसे यह कारोबार और गति पकड़ रहा है।

यूं तो मेडिकल न्यूट्रिशन का मार्केट पूरी दुनिया में ही बढ़ रहा है और माना जाता है कि अभी लगभग चालीस बिलियन यूएस डॉलर का कारोबार इस क्षेत्र में हो रहा है। भारत में भी मेडिकल न्यूट्रिशन का मार्केट इसी अनुरुप लगभग सात-आठ प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ रहा है और इस कारोबार के वर्तमान में चार बिलियन यूएस डॉलर से आगे निकल जाने का अनुमान है। लेकिन भ्रामक रूप से दवाओं के नाम से बेचे जाने वाले फूड सप्लीमेंट का कारोबार इससे कई गुना अधिक है। अनुमान है कि अभी देश में लगभग दस अरब रुपए सालाना का यह कारोबार हो रहा है। इतना ही नहीं, इस कारोबार में हर साल दस से पन्द्रह प्रतिशत की बढ़ोतरी भी दर्ज हो रही है। ऐसा अनुमान है।

इसका मुख्य कारण यह है कि ये फूड सप्लीमेंट अलग-अलग मार्के के साथ बनाए जाते हैं। ऐसे में जब डॉक्टर इसके लिए पर्ची लिखता है तो यह ब्रांड अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता और मरीज को निश्चित तौर पर डॉक्टर के आसपास की मेडिकल शॉप से ही खरीदना होता है। इसी में यह सारा खेल जुड़ा हुआ है।

ऐसे फूड सप्लीमेंट निर्माता डॉक्टर और रिटेलर को कमीशन के आधार पर फिक्स करते हैं और डॉक्टर की पर्ची पर खास दुकानों से मुंहमांगे दामों पर यह उत्पाद बेचे जाते हैं। चूंकि इनकी बिक्री मेडिकल स्टोर से की जाती है अत: सामान्यत: फूड इंस्पेक्टर भी इनके सैंपल्स वगैरह नहीं उठाते। जबकि यह दवा नहीं है। ऐसे में ड्रग इंस्पेक्टर चाहकर भी इनके सैंपल नहीं उठा पाते। ऐसे में गुणवत्ताहीन उत्पाद तैयार करके भी मनमाना मुनाफा बटोरा जाता है।

इसका एक उदाहरण राजस्थान सरकार की ओर से निदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं की ओर से संयुक्त निदेशक एवं मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को दिए गए विभिन्न आदेशों से भी साफ हो जाता है। इसकी ओर से बाकायदा आदेश जारी कर कहा गया है कि राज्य में प्रोटीन पाउडर पर मिलते-जुलते दवाओं के नाम लिखकर बेचने की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। प्रोटीन पाउडर खाद्य लाइसेंस के तहत निर्मित है और यह औषधि तथा प्रसाधन सामग्री के तहत औषधि नहीं है। अत: खाद्य पदार्थ के रूप में इन्हें देखा जाना चाहिए।